Pradosh Aaj: आज धनतेरस पर प्रदोष व्रत रखा जाएगा। शुक्रवार के दिन पड़ने के कारण यह व्रत शुक्र प्रदोष व्रत कहलाएगा। आज धनतेरस और प्रदोष के साथ कई शुभ योगों और नक्षत्र का निर्माण हो रहा है, जिससे आज का दिन बेहद खास माना जा रहा है। वहीं, प्रदोष और धनतेरस दोनों दिन संध्या पूजन का विशेष महत्व माना जाता है। इसलिए आइए जानते हैं शुक्र प्रदोष व्रत पूजा का मुहूर्त, विधि और कथा-

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प्रदोष पूजा मुहूर्त 
कार्तिक कृष्ण पक्ष त्रयोदशी तिथि प्रारम्भ – 12:35 पी एम, 10 नवंबर
कार्तिक कृष्ण पक्ष त्रयोदशी तिथि समाप्त- 01:57 पी एम, 11 नवंबर
संध्या पूजा मुहूर्त- 05:30 पी एम से 08:08 पी एम

प्रदोष पूजन विधि 
स्नान करने के बाद साफ वस्त्र धारण कर लें। संध्या के समय घर के मंदिर में और मुख्य द्वार पर गोधूलि बेला में दीपक जलाएं। फिर शिव मंदिर में भगवान शिव का अभिषेक करें और शिव परिवार की विधिवत पूजा-अर्चना करें। प्रभु पर कच्चा दूध, गंगाजल, बेलपत्र, सफेद चंदन, अक्षत और कनेर के पुष्प चढ़ाएं। अब प्रदोष व्रत की कथा सुनें। फिर घी के दीपक से पूरी श्रद्धा के साथ भगवान शिव की आरती करें। ओम नमः शिवाय का मंत्र-जाप करें। अंत में क्षमा प्रार्थना भी करें।

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प्रदोष व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक नगर में एक ब्राह्मणी रहती थी। उसके पति का स्वर्गवास हो गया था। उसका अब कोई सहारा नहीं था। इसलिए वह सुबह होते ही वह अपने पुत्र के साथ भीख मांगने निकल पड़ती थी। वह खुद का और अपने पुत्र का पेट पालती थी। एक दिन ब्राह्मणी घर लौट रही थी तो उसे एक लड़का घायल अवस्था में कराहता हुआ मिला। ब्राह्मणी दयावश उसे अपने घर ले आयी। वह लड़का विदर्भ का राजकुमार था। शत्रु सैनिकों ने उसके राज्य पर आक्रमण कर उसके पिता को बंदी बना लिया था और राज्य पर नियंत्रण कर लिया था इसलिए वह मारा-मारा फिर रहा था। राजकुमार ब्राह्मण-पुत्र के साथ ब्राह्मणी के घर रहने लगा।
एक दिन अंशुमति नामक एक गंधर्व कन्या ने राजकुमार को देखा तो वह उस पर मोहित हो गई। अगले दिन अंशुमति अपने माता-पिता को राजकुमार से मिलाने लाई। उन्हें भी राजकुमार पसंद आ गया। कुछ दिनों बाद अंशुमति के माता-पिता को शंकर भगवान ने स्वप्न में आदेश दिया कि राजकुमार और अंशुमति का विवाह कर दिया जाए। वैसा ही किया गया। ब्राह्मणी प्रदोष व्रत करने के साथ ही भगवान शंकर की पूजा-पाठ किया करती थी। प्रदोष व्रत के प्रभाव और गंधर्वराज की सेना की सहायता से राजकुमार ने विदर्भ से शत्रुओं को खदेड़ दिया और पिता के साथ फिर से सुखपूर्वक रहने लगा। राजकुमार ने ब्राह्मण-पुत्र को अपना प्रधानमंत्री बनाया। मान्यता है कि जैसे ब्राह्मणी के प्रदोष व्रत के प्रभाव से दिन बदले, वैसे ही भगवान शंकर अपने भक्तों के दिन फेरते हैं।

डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं। विस्तृत और अधिक जानकारी के लिए संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। 

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