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मां कात्यायनी की उपासना से दूर हो जाते हैं दरिद्रता और दुर्भाग्य

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नवरात्रि में छठे दिन मां कात्यायनी का पूजन किया जाता है। मां कात्यायनी बृहस्पति ग्रह पर आधिपत्य रखती हैं। महर्षि कात्यायन की पुत्री होने के कारण मां पार्वती के इन स्वरूप को कात्यायनी कहा जाता है। भगवान श्रीकृष्ण को पति रूप में पाने के लिए ब्रज की गोपियों ने मां कात्यायनी की पूजा कालिंदी-यमुना तट पर की थी। मां ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी हैं। 

मां की पूजा का सर्वश्रेष्ठ समय गोधूलि बेला है। मां की उपासना पीले फूलों से करनी चाहिए। मां को पीले रंग के वस्त्र अर्पित करें। बेसन के हलवे का भोग लगाना चाहिए। शृंगार में इन्हें हल्दी अर्पित करना श्रेष्ठ रहता है। मां कात्यायनी की उपासना में सरसों के तेल का दीपक जलाएं। गुगल से धूप करें। सूरजमुखी के फूल चढ़ाएं। केसर से तिलक करें तथा गुड़ चने का भोग लगाएं। पूजन के गुड़-चना गाय को खिला दें। माता रानी पर पुष्प, फल-फूल, चुनरी आदि अर्पित करें। मां को रोली कुमकुम लगाएं। मां कात्यायनी को शहद से बनी चीजों का भोग लगाएं। मां की उपासना से दुर्भाग्य से छुटकारा मिलता है। शत्रुता का अंत होता है। मां कात्यायनी का व्रत करने से कुंवारी कन्याओं के विवाह में आने वाली बाधा दूर हो जाती हैं। मां कात्यायनी की उपासना से दरिद्रता दूर होती है। 

इस आलेख में दी गईं जानकारियां धार्मिक आस्था और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैं, इसे सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।